शिक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए विधायक ओमप्रकाश धुर्वे का क्रांतिकारी विचार: सरकारी स्कूलों की दशा बदलने के लिए दिया बड़ा मंत्र



 मध्य प्रदेश सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री और शाहपुरा विधानसभा से भारतीय जनता पार्टी के विधायक ओमप्रकाश धुर्वे अपने बेबाक अंदाज और जनहित के मुद्दों पर स्पष्ट राय रखने के लिए हमेशा चर्चा में रहते हैं। हाल ही में शाहपुरा में आयोजित भव्य 'शाला प्रवेशोत्सव' कार्यक्रम के दौरान उन्होंने सरकारी शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर एक ऐसा साहसिक सुझाव दिया है जिसकी अब पूरे प्रदेश में सराहना हो रही है। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विधायक धुर्वे ने कहा कि यदि हम सच में सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलना चाहते हैं तो इसकी शुरुआत समाज के रसूखदार और जिम्मेदार लोगों से होनी चाहिए।

विधायक धुर्वे ने मंच से कड़े शब्दों में अपनी बात रखते हुए कहा कि यदि उन्हें कभी शिक्षा विभाग की कमान संभालने या नियम बनाने का अवसर मिला तो वह एक ऐसा अनिवार्य कानून बनाएंगे जिसके तहत सभी सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों के बच्चों को केवल सरकारी स्कूलों में ही पढ़ना होगा। उन्होंने स्पष्ट रूप से चेतावनी भरे लहजे में यह भी जोड़ा कि जो अधिकारी या कर्मचारी इस नियम का पालन नहीं करेगा उसकी पदोन्नति और अन्य सरकारी सुविधाएं तत्काल प्रभाव से रोक दी जानी चाहिए। उनका मानना है कि जब बड़े साहबों और नेताओं के बच्चे इन स्कूलों में बैठेंगे तो व्यवस्था में सुधार की गति अपने आप तेज हो जाएगी।

अपने संबोधन के दौरान उन्होंने सरकारी शिक्षकों की क्षमता पर भी गहरा भरोसा जताया और कहा कि योग्यता के मामले में सरकारी स्कूल किसी से पीछे नहीं हैं। विधायक जी ने जोर देकर कहा कि व्यवस्था में सुधार केवल भाषणों से नहीं बल्कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी से आता है। जब जिले के कलेक्टर, एसपी और खुद विधायक के बच्चे एक ही टाट-पट्टी पर बैठकर पढ़ेंगे तो स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं और पढ़ाई के स्तर में क्रांतिकारी बदलाव आएगा। उनके इस अनोखे और कड़े सुझाव का कार्यक्रम में मौजूद सैकड़ों अभिभावकों और स्थानीय नागरिकों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्वागत किया।

जनता के बीच विधायक ओमप्रकाश धुर्वे का यह बयान अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। लोग इसे शिक्षा के क्षेत्र में समानता लाने की दिशा में एक बहुत बड़ा और प्रभावी कदम मान रहे हैं। विधायक जी ने यह भी संदेश दिया कि नेताओं को केवल उपदेश देने के बजाय स्वयं उदाहरण पेश करना चाहिए ताकि आम जनता का सरकारी तंत्र पर विश्वास फिर से बहाल हो सके। शाहपुरा के इस 'शाला प्रवेशोत्सव' कार्यक्रम में दिया गया यह बयान आने वाले समय में प्रदेश की शिक्षा नीति के लिए एक बड़ी चर्चा का विषय बन सकता है।


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