डिण्डौरी: 4 साल से 'सिस्टम' की बलि चढ़ता एक मजदूर का हक मजदूरी न मिलने से बेटे की 'शिक्षा' की बलि और पलायन का दंश

डिण्डौरी। डिजिटल इंडिया और सुशासन के दावों के बीच डिण्डौरी जिले से सरकारी तंत्र की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने मानवीय संवेदनाओं पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। यह पूरा मामला ग्राम पंचायत नरायणडीह के ग्राम देवरी निवासी एक गरीब मजदूर संजू का है, जो पिछले 4 वर्षों से अपनी ही मेहनत की गाढ़ी कमाई (मनरेगा मजदूरी) पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। संजू की यह लड़ाई केवल पैसों के लिए नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और परिवार के भविष्य को बचाने की जद्दोजहद बन गई है।


CM हेल्पलाइन और बंद होती उम्मीदें

इस प्रकरण की विडंबना देखिए कि संजू ने अपने हक के लिए दो बार मुख्यमंत्री हेल्पलाइन (CM Helpline) का दरवाजा खटखटाया। लेकिन हैरानी की बात यह है कि बिना किसी ठोस निराकरण और बिना मजदूर को उसकी राशि मिले ही, तकनीकी जादूगरी से उसकी शिकायतों को बंद कर दिया गया। पंचायत स्तर से भी उसे कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। सवाल यह उठता है कि क्या जनसमस्याओं के निवारण के लिए बने ये पोर्टल केवल 'कागजी आंकड़े' सुधारने का जरिया बन गए हैं? बिना समाधान के शिकायत का बंद होना सिस्टम की पारदर्शिता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।

मजदूरी न मिलने से पलायन का दंश और मासूम की शिक्षा का बलिदान

आर्थिक तंगी जब बर्दाश्त से बाहर हुई, तो संजू को अपनी पत्नी और बेटे भुवनेश्वर के साथ हैदराबाद पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा। पलायन के कारण वह पिछले एक साल से जिले से बाहर था, जिससे उसकी कानूनी लड़ाई और भी कमजोर हो गई। इस मजबूरी की सबसे बड़ी कीमत उसके मासूम बेटे को चुकानी पड़ी; संसाधनों के अभाव में संजू अपने बेटे का स्कूल में दाखिला तक नहीं करा सका।

 जब एक मजदूर की मेहनत का पैसा 'सिस्टम' की फाइलों में दब जाता है, तो सिर्फ एक घर का चूल्हा नहीं बुझता, बल्कि एक बच्चे का भविष्य भी अंधकार में डूब जाता है। क्या 'सुशासन' में एक मासूम की शिक्षा की कीमत तकनीकी लापरवाही से कम है?

जनसुनवाई: दफ्तरों के फेर में उलझती न्याय की उम्मीद

एक साल पहले भी संजू जिला मुख्यालय की जनसुनवाई में अपनी गुहार लगा चुका था। मंगलवार 31/03/2026 को वह फिर एक आखिरी उम्मीद लेकर पहुँचा, लेकिन यहाँ भी उसे केवल एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर ही दौड़ाया गया। जिला पंचायत सीईओ ने उसे जनपद पंचायत जाने का निर्देश देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। जब पीड़ित जनपद कार्यालय पहुँचा, तो वहां भी जवाबदेह अधिकारी मौजूद नहीं थे। बताया गया कि वित्तीय वर्ष की 'क्लोजिंग' के चलते अधिकारी व्यस्त हैं, लेकिन क्या कोई उस मजदूर के घर की 'आर्थिक क्लोजिंग' का हिसाब रखेगा जो अब वापस लौटने के किराए तक के लिए मोहताज है?

आश्वासन और समाधान की प्रतीक्षा

अंततः जनपद कार्यालय में मौजूद असिस्टेंट प्रोग्राम ऑफिसर (APO) भोजराज परस्ते ने संजू के दस्तावेज लेते हुए कार्यवाही का आश्वासन दिया है। हालांकि, 4 साल की लंबी लड़ाई और अपने बच्चे की शिक्षा का बलिदान देने के बाद भी आज संजू को एक बार फिर खाली हाथ ही लौटना पड़ा।

 संजू का यह संघर्ष यह बताने के लिए काफी है कि कैसे निचले स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही और टालमटोल की नीति एक गरीब परिवार को तबाह कर सकती है। उम्मीद है कि जिला प्रशासन इस बार संजू को उसका हक दिलाकर व्यवस्था के प्रति खोते विश्वास को बहाल करेगा।

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