डिंडौरी। जिला मुख्यालय में शनिवार की रात एक बड़ी अप्रिय घटना होते-होते रह गई। शहर के समरस माहौल के बीच जिस तरह से असामाजिक तत्वों ने सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास किया, उसे नगर कोतवाली पुलिस की तत्परता और सूझबूझ ने समय रहते विफल कर दिया। कोतवाली प्रभारी और उनकी टीम की सक्रियता का ही परिणाम है कि वर्तमान में स्थिति पूरी तरह सामान्य है। लेकिन, पुलिस की इस मेहनत पर नगर परिषद और आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली प्रश्नचिह्न खड़ी कर रही है।
गली-गली में पसरता अवैध कारोबार: नियमों को ठेंगा
डिंडौरी में मांस, मछली और अंडा विक्रेताओं के लिए स्थान तो निर्धारित किए गए हैं, लेकिन विडंबना यह है कि ये कारोबारी अब आवंटित जगहों को छोड़कर शहर के रिहाइशी इलाकों और मुख्य सड़कों पर अपनी पैठ जमाए बैठे हैं। मुख्यमंत्री के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, पवित्र नर्मदा तट के समीप और घनी आबादी वाली गलियों में खुलेआम दुकानें सज रही हैं। नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि जब मीडिया इस 'सुप्त' प्रशासन को जगाता है, तो महज औपचारिकता के लिए दो दिन की कार्रवाई होती है और तीसरे दिन जिम्मेदार फिर से मौन साध लेते हैं। यह चक्र आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है?
आबकारी विभाग की चुप्पी: अवैध मदिरा से पनपती अराजकता
शहर के सौहार्द को असली खतरा आबकारी विभाग की 'रहस्यमयी खामोशी' से है। डिंडौरी की गलियों में अवैध मदिरा की पहुँच इतनी सुगम हो चुकी है कि अब नियमों का डर समाप्त होता दिख रहा है। रिहाइशी क्षेत्रों में शराब की निर्बाध बिक्री ने असामाजिक तत्वों के हौसले बुलंद कर दिए हैं। पुलिस रात-दिन गश्त कर शांति बनाने का प्रयास करती है, लेकिन जब तक आबकारी विभाग अवैध शराब के इस 'तंत्र' पर नकेल नहीं कसेगा, तब तक सड़कों पर अराजकता का माहौल कम होना कठिन जान पड़ता है।
प्रशासन की 'क्षणभंगुर' सक्रियता का रहस्य
यह डिंडौरी के जागरूक नागरिकों के लिए चिंता का विषय है कि आखिर संबंधित विभागों की सक्रियता केवल मीडिया की खबरों तक ही क्यों सीमित रहती है? जब भी कोई संकट आता है, तो पुलिस विभाग ही ढाल बनकर खड़ा होता है, जैसा कि हाल ही में कोतवाली पुलिस ने कर दिखाया। लेकिन क्या नगर परिषद और आबकारी विभाग ने अपनी नैतिक जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया है? जनता पूछ रही है कि आखिर वह क्या कारण है कि बड़ी कार्रवाइयों के कुछ समय बाद ही स्थितियां पुनः 'जस की तस' हो जाती हैं।
वर्तमान में डिंडौरी की शांति पुलिस की मुस्तैदी के भरोसे सुरक्षित है। लेकिन यदि नगर परिषद ने इन अवैध दुकानों को उनके निर्धारित स्थान पर स्थाई रूप से स्थानांतरित नहीं किया और आबकारी विभाग ने अवैध शराब की आपूर्ति को ध्वस्त नहीं किया, तो पुलिस के प्रयासों को स्थाई परिणाम मिलना चुनौतीपूर्ण होगा। अब देखना यह है कि डिंडौरी का यह प्रशासनिक तंत्र कब स्थाई रूप से सजग होता है।
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