लखनऊ के भीषण अग्निकांड की तपिश अभी शांत भी नहीं हुई है कि डिंडौरी नगर में भी हादसों को खुला निमंत्रण देने का खेल बदस्तूर जारी है। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारा स्थानीय प्रशासन और नगर परिषद किसी बहुत बड़े चमत्कार के इंतजार में हैं, क्योंकि फिलहाल तो पूरा शहर सिर्फ और सिर्फ जगत जननी नर्मदा मैया की असीम कृपा और आशीर्वाद के भरोसे ही चल रहा है। जनप्रतिधियों से लेकर जिम्मेदार अधिकारियों तक, हर कोई शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर गाड़े बैठा है और शहर में 'सब चंगा सी' का मधुर राग अलापा जा रहा है।
अगर आंकड़ों की बाजीगरी देखनी हो तो डिंडौरी नगर परिषद और प्रशासनिक अमले से बेहतर कोई नहीं। पिछले महीने बड़े जोर-शोर से शहर में अतिक्रमणकारियों को २०० से अधिक नोटिस बांटे गए थे। जनता को लगा कि शायद इस बार व्यवस्था का बुलडोजर जागेगा, लेकिन उन नोटिसों की फाइलें किस ठंडे बस्ते में दफन हो गईं, इसका जवाब आज तक किसी के पास नहीं है। अतिक्रमण हटाने के नाम पर केवल कागजों का पेट भरा गया और जमीनी हकीकत जस की तस बनी हुई है। नगर परिषद की दिव्य दृष्टि को शहर की वो तंग और संकरी गलियां शायद दिखाई ही नहीं देतीं, जहां से आज की तारीख में एक दो-पहिया वाहन भी बमुश्किल गुजर पाता है। खुदा न खास्ता अगर इन घनी बस्तियों में कभी कोई अप्रिय घटना या अग्निकांड हो जाए, तो दमकल की बड़ी गाड़ियों का वहां पहुंचना तो दूर, झांकना भी नामुमकिन है। कुछ ही दिनों पहले एक सजग अधिकारी की सूझबूझ और तत्परता से शहर में एक बड़ा अग्निकांड होने से टल गया था, जिसकी रिपोर्ट हमने आपको दिखाई भी थी, परंतु उस घटना से भी किसी जिम्मेदार ने कोई सबक नहीं लिया।
बिजली विभाग के मेंटेनेंस के दावों की पोल तो शहर का हर नुक्कड़ और चौराहा खुद ब खुद खोल रहा है। जगह-जगह खुले पड़े जंक्शन बॉक्स और मौत को दावत देते झूलते हुए बिजली के नंगे तार विभाग की मुस्तैदी की कहानी बयां कर रहे हैं। ओवरलोडिंग का यह आलम है कि आए दिन ट्रांसफार्मर धूं-धूं कर जल रहे हैं और विभाग केवल बजट खपाने में व्यस्त है।
फायर सेफ्टी के नाम पर तो सरकारी भवनों का हाल और भी बदतर है। यदि आज निष्पक्ष जांच करा ली जाए तो अधिकांश शासकीय कार्यालयों में टंगे अग्निशमन यंत्र या तो पूरी तरह कबाड़ हो चुके हैं या उनकी एक्सपायरी डेट सालों पहले निकल चुकी है। विडंबना देखिए कि जहां सुरक्षा उपकरण सही सलामत हैं, वहां के स्टाफ को उन्हें चलाना तक नहीं आता।
अभी कुछ दिन पहले खुद जिला अस्पताल में औचक निरीक्षण के दौरान कलेक्टर महोदय को अपने हाथों से बकायदा डेमो देकर सिखाना पड़ा था कि फायर सिलेंडर काम कैसे करता है। जब जिला मुख्यालय के मुख्य अस्पताल का यह हाल है, तो बाकी विभागों की राम कहानी समझी जा सकती है।
व्यावसायिक लालच और प्रशासनिक अनदेखी का सबसे खतरनाक कॉकटेल शहर के घरेलू इलाकों में देखने को मिल रहा है। रिहायशी क्षेत्रों के बीचों-बीच धड़ल्ले से होटल और रेस्टोरेंट संचालित हो रहे हैं, जहां नियमों को ताक पर रखकर घरेलू रसोई गैस सिलेंडरों का कमर्शियल इस्तेमाल किया जा रहा है।
नागरिक आपूर्ति विभाग का रवैया ऐसा है कि जब ईरान तेल संकट का समय था, तब तो थोड़ी-बहुत सक्रियता दिखाई दी थी, लेकिन संकट टलते ही विभाग पुनः कुंभकरणी नींद में सो गया है।
सूत्रों और दबी जुबान में चर्चाओं की मानें तो नगर में 'चढ़ावा चढ़ाओ और एनओसी पाओ' का खेल परदे के पीछे धड़ल्ले से चल रहा है। गलियारों में तो यह अफवाह भी गर्म है कि खाद्य सुरक्षा विभाग ने कल ही कहीं छापामार कार्रवाई की थी, लेकिन कथित तौर पर मौके पर ही 'डील' पक्की हो गई और मामला रफा-दफा कर दिया गया।
इतना ही नहीं, नगर परिषद द्वारा हर महीने आवारा पशुओं को पकड़ने वाली 'हाका गैंग' के नाम पर हजारों-लाखों रुपयों का भुगतान कागजों पर चमकाया जा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि मुख्य सड़कों से लेकर हर चौराहे पर आवारा मवेशी डेरा डाले बैठे हैं, जिससे आए दिन राहगीर चोटिल हो रहे हैं।
वहीं ट्रैफिक विभाग की अपनी ही निराली कहानी है; जब भी अव्यवस्था पर सवाल उठाओ तो अमले और स्टाफ की कमी का पुराना रोना रो दिया जाता है, लेकिन शहर की सड़कों पर चलने वाली चर्चाओं के अनुसार 'स्टाफ भले ही कम हो, पर माल पूरा होना चाहिए' की अफवाहें जोरों पर रहती हैं।
कुल मिलाकर जनता तो हमेशा की तरह पिसने के लिए ही बनी है, क्योंकि हमारे तंत्र की यह पुरानी परंपरा रही है कि जब तक कोई बड़ी और भयावह त्रासदी न हो जाए, तब तक कागजी नींद से नहीं जागा जाता। अब देखना यह है कि नर्मदा मैया की कृपा कब तक इस अव्यवस्था के बोझ को संभाल कर रखती है।
डिस्क्लेमर (Legal Disclaimer): यह एक खोजी और विश्लेषणात्मक समाचार रिपोर्ट है, जिसका उद्देश्य जनहित में स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्थाओं, जनचर्चाओं और अव्यवस्थाओं को उजागर करना है। इस रिपोर्ट में शामिल कुछ तथ्य स्थानीय सूत्रों, जनचर्चाओं और सोशल मीडिया पर प्रसारित समाचार पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी भी विभाग, अधिकारी या जनप्रतिनिधि की छवि को व्यक्तिगत रूप से धूमिल करना नहीं, बल्कि जन सुरक्षा के प्रति सचेत करना है।
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