जबलपुर। संभाग का 'असिस्टेंट रजिस्ट्रार फर्म एवं संस्थाएं' कार्यालय इन दिनों अपनी कार्यप्रणाली को लेकर सवालों के घेरे में है। 9 जिलों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालने वाला यह विभाग कथित तौर पर कर्मचारियों की कमी और प्रशासनिक तालमेल के अभाव में 'भगवान भरोसे' चल रहा है। आलम यह है कि नई संस्थाओं के पंजीयन के लिए आने वाले आवेदकों को दफ्तर के चक्कर काटने को मजबूर होना पड़ रहा है।
कर्मचारियों की कमी से काम प्रभावित
जानकारों के मुताबिक, इस कार्यालय पर जबलपुर सहित संभाग के 9 जिलों का प्रभार है। इतनी बड़ी जिम्मेदारी होने के बावजूद विभाग में अमले की भारी कमी बताई जा रही है। आवेदकों का आरोप है कि कार्यालय में अक्सर संबंधित बाबू और अधिकारी अपनी सीटों पर मौजूद नहीं रहते, जिससे दूर-दराज से आने वाले लोगों को घंटों इंतजार के बाद खाली हाथ लौटना पड़ता है।
ऑनलाइन व्यवस्था और तकनीकी उलझनें
यूं तो संस्था पंजीयन की प्रक्रिया ऑनलाइन है, लेकिन आवेदकों ने शिकायत की है कि विभाग द्वारा अक्सर तकनीकी आपत्तियां लगाकर आवेदन लटका दिए जाते हैं। आवेदकों के अनुसार, कई बार 'नाम की समानता' जैसी आपत्तियां तो लगा दी जाती हैं, लेकिन उनका स्पष्ट समाधान नहीं बताया जाता। कुछ आवेदकों ने नाम न छापने की शर्त पर आरोप लगाया कि इन प्रक्रियाओं की जटिलता के कारण उन्हें मानसिक और आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।
लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद भी सुधार का इंतज़ार
गौरतलब है कि सितंबर 2025 में इसी कार्यालय की एक महिला कर्मचारी को लोकायुक्त द्वारा कथित तौर पर ₹5000 की रिश्वत लेते हुए ट्रैप किया गया था। इस कार्रवाई के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि विभाग की कार्यशैली में पारदर्शिता आएगी, लेकिन वर्तमान स्थितियां कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। भ्रष्टाचार के इन पुराने मामलों और वर्तमान की अव्यवस्थाओं के बीच नई संस्थाओं का पंजीयन कराने वाले लोग खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।
प्रशासनिक हस्तक्षेप की दरकार
संस्था पंजीयन कराने आए लोगों ने मांग की है कि विभाग में रिक्त पदों को भरा जाए और ऑनलाइन आपत्तियों के निराकरण के लिए एक पारदर्शी समय-सीमा तय की जाए। यदि प्रशासन ने समय रहते इस कार्यालय की सुध नहीं ली, तो संभाग के हजारों आवेदकों की फाइलें धूल फांकती रहेंगी।
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