डिंडोरी | सरकार की मंशा अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की गारंटी देने और पलायन रोकने की होती है। इसके लिए योजनाओं को नया रूप दिया जाता है, नए पोर्टल बनाए जाते हैं और NMMS (डिजिटल हाजिरी) जैसे सख्त नियम लागू किए जाते हैं। लेकिन जब यही तकनीकी नियम और प्रशासनिक पेच मजदूरों के हक की राशि रोक लेते हैं, तो पूरी व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़ा हो जाता है।
33 करोड़ से अधिक का भुगतान लंबित: सूत्रों का दावा प्राप्त जानकारी और सूत्रों के हवाले से यह खबर सामने आ रही है कि डिंडोरी जिले में मनरेगा के तहत काम करने वाले मजदूरों का लगभग ₹33.79 करोड़ का भुगतान कथित रूप से लंबे समय से अटका हुआ है। बताया जा रहा है कि नवंबर 2025 से मजदूरों के खातों में राशि नहीं पहुंची है। केवल श्रमिक ही नहीं, बल्कि ग्राम रोजगार सहायक और तकनीकी कर्मचारी भी महीनों से अपने मानदेय का इंतजार कर रहे हैं। सामग्री सप्लायरों का भुगतान रुकने से ग्रामीण क्षेत्रों में निर्माण कार्यों की गति भी कथित तौर पर थम सी गई है।
पलायन की मजबूरी और प्रशासनिक उम्मीद स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि समय पर मजदूरी न मिलने के कारण ग्रामीण अब रोजी-रोटी के लिए शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं। ऐसे में जिले के जागरूक नागरिकों और प्रभावित श्रमिकों की नजरें अब जिले के वरिष्ठ नेतृत्व पर टिकी हैं।
आम जनता और क्षेत्र के विकास के प्रति समर्पित जिला कलेक्टर अंजु पवन भदोरिया और CEO जिला पंचायत दिव्यांशु चौधरी (IAS) से क्षेत्रवासियों को काफी उम्मीदें हैं। सूत्रों का कहना है कि यदि जिले के ये शीर्ष अधिकारी इस संवेदनशील मामले का संज्ञान लेकर पोर्टल संबंधी तकनीकी बाधाओं को दूर करवाएं और शासन स्तर पर समन्वय स्थापित करें, तो हजारों गरीब परिवारों को इस भीषण आर्थिक संकट से राहत मिल सकती है।
जवाबदेही और डिजिटल इंडिया का लक्ष्य नियमों के मुताबिक, काम पूरा होने के 15 दिनों के भीतर भुगतान हो जाना चाहिए। लेकिन डिंडोरी के सात ब्लॉकों—समनापुर, मेहंदवानी, शहपुरा, अमरपुर, डिंडोरी, बजाग और करंजिया—में स्थिति वर्तमान में चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस लंबित भुगतान को कितनी प्राथमिकता पर रखता है और पलायन रोकने के लिए क्या प्रभावी कदम उठाता है।
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