डिंडौरी: कमिश्नर की समीक्षा बैठक में विकास कार्यों की पड़ताल; क्या 5 दिन का अल्टीमेटम सुधारेगा व्यवस्था?

 डिंडौरी | 28 जनवरी, 2026 संभागीय आयुक्त श्री धनंजय सिंह भदौरिया ने बुधवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से शासन की प्राथमिकता वाली योजनाओं और विभागीय कार्यों की विस्तृत समीक्षा की। इस उच्च स्तरीय बैठक में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित कलेक्टर्स कॉन्फ्रेंस के पालन प्रतिवेदन पर मुख्य रूप से चर्चा की गई। बैठक में राजस्व और सामान्य प्रशासन से जुड़े मामलों, जैसे राजस्व न्यायालयों में लंबित प्रकरणों का समय-सीमा में निराकरण, सीएम हेल्पलाइन, लोक सेवा गारंटी और लोकायुक्त कार्यालय से प्राप्त शिकायतों की वर्तमान स्थिति को खंगाला गया। इसके अलावा, सड़क सुरक्षा के लिए ब्लैक स्पॉट रेक्टिफिकेशन, अनुकंपा नियुक्ति और पेंशन प्रकरणों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी कमिश्नर ने कड़े निर्देश दिए।

ग्रामीण विकास और कृषि क्षेत्र की समीक्षा के दौरान मनरेगा के लेबर बजट, प्रधानमंत्री आवास योजना की प्रगति और मध्यान्ह भोजन के संचालन पर विस्तार से चर्चा हुई। कृषि विभाग के अंतर्गत धान उपार्जन, खाद-बीज की उपलब्धता और 'धरती माता बचाओ' जैसे अभियानों के साथ-साथ प्राकृतिक खेती के लिए बीआरसी स्थापना पर भी बात की गई। स्वास्थ्य विभाग ने सिकल सेल उपचार और आयुष्मान भारत योजना के तहत वरिष्ठ नागरिकों के पंजीयन की रिपोर्ट पेश की। बैठक के अंत में कलेक्टर श्रीमती अंजू पवन भदौरिया ने जिले के सभी विभागीय अधिकारियों को सख्त हिदायत दी कि शासन की योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्तियों तक समय पर पहुंचे और सभी लंबित लक्ष्यों को आगामी 5 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से पूरा किया जाए।

प्रशासनिक जवाबदेही और जनहित से जुड़े कुछ अहम सवाल

प्रशासनिक समीक्षा की इस विस्तृत रिपोर्ट के बाद कुछ ऐसे बुनियादी सवाल खड़े होते हैं जिनका सीधा सरोकार आम जनता से है। सबसे पहला और गंभीर सवाल राजस्व और शिकायतों के निराकरण को लेकर है। यदि जिला प्रशासन राजस्व मामलों को समय-सीमा में निपटाने का दावा करता है, तो आखिर सीएम हेल्पलाइन और लोकायुक्त तक शिकायतों का यह निरंतर प्रवाह क्या दर्शाता है? क्या निचले स्तर पर शिकायतों के निराकरण की गुणवत्ता की कोई स्वतंत्र जांच की जा रही है, या केवल कागजों पर शिकायतों को 'क्लोज' किया जा रहा है? कानूनी रूप से, लोक सेवा गारंटी का उद्देश्य जनता को त्वरित न्याय देना है, लेकिन फाइलों की बढ़ती संख्या कहीं न कहीं व्यवस्था की सुस्ती को उजागर करती है।

दूसरा महत्वपूर्ण विषय विकास कार्यों की भौतिक प्रगति का है। जल जीवन मिशन और ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के अंतर्गत निर्माणाधीन कार्यों की समीक्षा तो की गई, लेकिन क्या प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि 5 दिन के इस अल्टीमेटम के दबाव में काम की गुणवत्ता से समझौता न हो? अक्सर देखा गया है कि लक्ष्यों को पूरा करने की जल्दबाजी में निर्माण कार्यों के मानकों की अनदेखी की जाती है। क्या जिले के वरिष्ठ अधिकारी उन ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा करेंगे जहां नल-जल योजनाएं कागजों पर पूर्ण घोषित हैं लेकिन जनता को आज भी पानी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है? जनहित में यह आवश्यक है कि योजनाओं की सफलता का पैमाना केवल 'व्यय किया गया बजट' न होकर 'धरातल पर मिला लाभ' होना चाहिए।

अंततः, 5 दिन की यह संक्षिप्त समय-सीमा प्रशासन की पूर्व की कार्यप्रणाली पर भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है। जो कार्य नियमित समय में पूरे होने चाहिए थे, उनके लिए इस प्रकार के इमरजेंसी आदेशों की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? क्या यह माना जाए कि पूर्व में मॉनिटरिंग और जवाबदेही की कमी रही है? स्वास्थ्य और पोषण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर केवल पंजीयन के आंकड़ों को उपलब्धि मान लेना कितना तार्किक है, जबकि जिले के दूरदराज के अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की बुनियादी कमी आज भी एक चुनौती बनी हुई है। प्रशासन को इन सवालों पर आत्ममंथन करना चाहिए ताकि विकास केवल फाइलों में नहीं, बल्कि डिंडौरी की सड़कों और गांवों में दिखाई दे।

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