गाड़ासरई (डिंडौरी): पिछले महीने डिंडौरी जिले के गाड़ासरई क्षेत्र में नापतौल विभाग द्वारा बांटों और नापतौल की मशीनों के सत्यापन और चेकिंग हेतु एक विशेष ड्राइव चलाई गई थी, जो अब गंभीर सवालों के घेरे में आती दिख रही है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस पूरी प्रक्रिया के दौरान भारी वित्तीय अनियमितताएं और विभागीय लापरवाही के मामले सामने आ रहे हैं। क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है कि किस प्रकार नियमों को ताक पर रखकर डिंडौरी की ही एक निजी फर्म को वेंडर नियुक्त कर दिया गया। खबर है कि इस फर्म के द्वारा दुकानों की चेकिंग कर विभाग के नाम पर रसीदें काटी गईं और व्यापारियों से मनमर्जी से राशि वसूली गई, जिससे पूरे गाड़ासरई क्षेत्र के व्यापारियों में असमंजस और डर का माहौल व्याप्त है।
सूत्रों का दावा है कि वेंडर द्वारा वसूली गई यह कुल राशि लाखों में बताई जा रही है |इस पूरे घटनाक्रम की सत्यता जानने के लिए जब हमने नापतौल अधिकारी श्री एन. एस. कीर से संपर्क किया और उनसे इस प्रक्रिया के बारे में चर्चा की, तो शुरुआत में उनका कहना था कि विभाग द्वारा किया गया सारा कार्य पूरी तरह नियमानुसार है। किंतु वास्तविकता कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। पिछले लगभग एक माह से जब भी हमने उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलकर इस संबंध में विस्तृत जानकारी लेने की कोशिश की, तो हर बार कोई न कोई बहाना बना दिया गया। कभी बताया जाता है कि साहब मुख्यालय से बाहर हैं तो कभी व्यस्तता का हवाला दिया जाता है। जब हमने फोन पर उनसे वेंडर की नियुक्ति की प्रक्रिया, नियमानुसार निर्धारित शासकीय शुल्क और वेंडर द्वारा वसूली गई राशि को सरकारी कोष में जमा करने के प्रमाणों के बारे में पूछा, तो वे संतोषजनक उत्तर देने के बजाय टालमटोल करते नजर आए।
शासकीय नियमों के अनुसार, विधिक माप विज्ञान अधिनियम (Legal Metrology Act) के तहत किसी भी उपकरण का सत्यापन और उसकी फीस का निर्धारण सरकार द्वारा तय किया जाता है और यह राशि सीधे शासकीय खजाने में जमा होनी चाहिए। किसी भी निजी फर्म को विभागीय अधिकारों का प्रयोग कर मनमानी वसूली करने की छूट नहीं दी जा सकती। अधिकारी द्वारा जानकारी साझा करने में दिखाई जा रही यह झिझक कई बड़े सवाल खड़े करती है। आखिर ऐसी कौन सी जानकारी है जिसे सार्वजनिक करने से विभाग कतरा रहा है? हमने इस मामले की तह तक जाने का निर्णय लिया है क्योंकि हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष पर निराधार आरोप लगाना नहीं, बल्कि व्यवस्था में पारदर्शिता लाना और जनता के हितों की रक्षा करना है। अब इस पूरे मामले को और इसकी संदिग्ध कार्यप्रणाली को जिलाधिकारी (कलेक्टर) के समक्ष उठाने का समय है ताकि शासन के नियमों की रक्षा हो सके और सच सामने आ सके।
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