डिंडौरी: DMF की संयुक्त बैठक में विकास का खाका तैयार, पर ₹4.20 करोड़ के प्रस्ताव और अटके ऑडिट ने खड़े किए बड़े सवाल

डिंडौरी: जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMF) की कार्यपालिका समिति एवं न्यास मण्डल की संयुक्त बैठक बुधवार को कलेक्ट्रेट सभाकक्ष में संपन्न हुई। कलेक्टर श्रीमती अंजू पवन भदौरिया की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में आगामी वित्तीय वर्ष के लिए विकास योजनाओं को मंजूरी दी गई, वहीं पूर्व के कार्यों की समीक्षा भी की गई।

 बैठक के मुख्य बिंदु और विकास कार्ययोजना

प्रशासन द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक जिला खनिज प्रतिष्ठान मद में कुल ₹71,49,908 की राशि उपलब्ध है। नियमों के तहत इस राशि का 60 प्रतिशत (₹42.89 लाख) उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों जैसे पेयजल, स्वास्थ्य, और शिक्षा पर खर्च किया जाएगा, जबकि शेष 40 प्रतिशत राशि बुनियादी ढांचे और ऊर्जा विकास के लिए आरक्षित की गई है।

बैठक में बताया गया कि वित्तीय वर्ष 2023-24 में प्राप्त ₹56.59 लाख की राशि से पुराने केंद्रीय विद्यालय में कोचिंग क्लासेस, स्कूलों में नलकूप खनन और छात्रावासों में खेल सामग्री वितरण जैसे जनहितैषी कार्य किए जा रहे हैं। आगामी बजट में मुड़की-शहडोल मार्ग निर्माण, आयुर्वेदिक महाविद्यालय, मॉडल कॉलेज पहुंच मार्ग और इमली कुटी डेम की ऊंचाई बढ़ाने जैसे महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर सर्वसम्मति बनी। बैठक में विधायक श्री ओमप्रकाश धुर्वे, श्री ओमकार सिंह मरकाम और जिला पंचायत अध्यक्ष श्री रूद्रेश परस्ते सहित वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।


विशेष रिपोर्ट: विकास के दावों के बीच पारदर्शिता और जवाबदेही के अनसुलझे सवाल

सरकारी प्रेस नोट में विकास की उज्ज्वल तस्वीर पेश की गई है, लेकिन प्रशासन के ही आंकड़ों और प्रक्रियात्मक नियमों के आधार पर कुछ ऐसे सवाल उठ रहे हैं जिनका उत्तर सार्वजनिक होना जनहित में आवश्यक प्रतीत होता है।

1. पशुपालन विभाग के ₹4.20 करोड़ के प्रस्ताव का आधार क्या है? बैठक में पशुपालन एवं डेयरी विभाग द्वारा ₹420 लाख (4.20 करोड़) के विभागीय भवनों के निर्माण का प्रस्ताव रखा गया है। चूँकि DMF फंड में वर्तमान में उपलब्ध राशि लगभग ₹71 लाख है, ऐसे में इतने विशालकाय प्रस्ताव के लिए बजट का स्रोत क्या होगा? क्या इस प्रोजेक्ट की कोई विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार की गई है? यदि हाँ, तो विभाग को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि ये भवन किन विशिष्ट ग्रामों में बनेंगे और इनकी तकनीकी स्वीकृति (TS) किस अधिकारी द्वारा दी गई है। बिना स्वीकृत DPR के करोड़ों के आवंटन की चर्चा प्रक्रियात्मक पारदर्शिता पर सवाल खड़ी करती है।

2. ऑडिट रिपोर्ट में देरी और पूर्व कार्यों की 'ओके रिपोर्ट' पर संशय बैठक में पूर्व वित्तीय वर्षों की ऑडिट रिपोर्ट के अनुमोदन की बात कही गई है। सवाल यह है कि विगत वर्षों के ऑडिट में इतनी देरी क्यों हुई? साथ ही, जिन नलकूप खनन और कोचिंग क्लासेस जैसे कार्यों को 'प्रगति पर' या 'पूर्ण' बताया जा रहा है, उनका भौतिक सत्यापन किस इंजीनियर या एजेंसी ने किया है? क्या उन अधिकारियों के नाम सार्वजनिक किए जाएंगे जिन्होंने इन कार्यों की 'ओके रिपोर्ट' दी है?

3. जनता के हक की राशि और जानकारी का अधिकार चूँकि जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMF) का धन सीधे तौर पर खनन प्रभावित क्षेत्रों की जनता का है, इसलिए यह मांग उठना लाजिमी है कि प्रत्येक स्वीकृत कार्य की प्रगति रिपोर्ट समय-समय पर जिला प्रशासन की वेबसाइट पर साझा की जाए। पारदर्शिता के अभाव में वित्तीय अनियमितता की आशंका बनी रहती है, जिसे दूर करना प्रशासन की वैधानिक जिम्मेदारी है।

4. पुराने प्रोजेक्ट्स और नई चुनौतियां एक ओर नए रपटा पुल और बैडमिंटन हॉल की आवश्यकता पर चर्चा हो रही है, वहीं दूसरी ओर नगर की जर्जर पाइपलाइनें और नर्मदा जल को प्रदूषित होने से बचाने वाले पुराने प्रोजेक्ट्स की स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है। क्या नए प्रस्तावों की चकाचौंध में पुराने अधूरे कार्यों की जवाबदेही तय की जाएगी?

डिंडौरी की जागरूक जनता अब केवल बैठक के प्रस्तावों तक सीमित नहीं रहना चाहती; वह चाहती है कि प्रत्येक सरकारी रुपये का हिसाब, संबंधित ठेकेदार का नाम और कार्य की गुणवत्ता की रिपोर्ट 'श्वेत पत्र' के माध्यम से सामने आए।

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