क्या मैदानी अमला और 'कथित विसंगतियां' बिगाड़ रही हैं सुशासन का खेल?
डिंडौरी। जिला मुख्यालय से
लेकर सुदूर अंचलों तक बैठकों का दौर जारी है, निर्देश दिए जा रहे हैं, लेकिन क्या धरातल पर वास्तविक परिवर्तन
हो रहा है? जिले की वर्तमान
स्थिति को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि कलेक्टर महोदया एक 'अकेली योद्धा' की तरह व्यवस्था सुधारने का प्रयास कर
रही हैं, किंतु विश्वस्त सूत्रों के अनुसार,
उनके अधीनस्थ कुछ अधिकारी और कर्मचारी
इस मंशा को अपेक्षित सहयोग प्रदान नहीं कर रहे हैं।
| फाइल फोटो |
संवादहीनता या 'प्रजा' जैसा
व्यवहार?
जिले
के कई कार्यालयों की स्थिति यह है कि जिम्मेदार अधिकारी अक्सर सीटों से नदारद रहते
हैं। जनचर्चा है कि फोन उठाना तो दूर, व्यक्तिगत भेंट करने पर भी संतोषजनक उत्तर नहीं मिलते। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ (मीडिया) और आम जनता के प्रति
कुछ अधिकारियों का व्यवहार आज भी 'राजा-प्रजा'
काल की याद दिलाता है। जब जमीनी स्तर पर
प्रशासनिक इकबाल की कमी महसूस होने लगे, तो उच्च स्तर के 'इनिशिएटिव्स' का
प्रभावित होना स्वाभाविक है।
कथित 'वित्तीय अनियमितताओं' और 'प्रक्रियात्मक
चूक' की लंबी फेहरिस्त:
·
वन
विभाग एवं स्टॉक का रहस्य: चर्चा है कि हजारों टन लकड़ी को 'सड़ा हुआ' बताकर स्टॉक से हटाने की प्रक्रिया
अपनाई गई है। RTI में
जानकारी न मिलना इस प्रक्रियात्मक
पारदर्शिता पर सवाल उठाता है।
·
PMGSY का
'तकनीकी जादू':
जिस मार्ग को तकनीकी रूप से 'टर्मिनेट' बताकर भुगतान रोका गया था, उसका मात्र 15 दिन में भुगतान हो जाना कथित विसंगति की ओर इशारा करता है।
·
जनजातीय
कार्य एवं शिक्षा विभाग: एक विशेष पिछड़ी जनजाति (बैगा) शिक्षक
का 9 वर्षों से मानदेय
लंबित होना और छात्रावासों (जैसे कस्तूरबा गांधी छात्रावास) में खाद्य सामग्री व
अन्य वस्तुओं के फर्जी
बिलों के माध्यम से कथित अनियमितता की खबरें चिंताजनक हैं।
·
स्वास्थ्य
एवं राजस्व विभाग: जिला अस्पताल के औचक निरीक्षण के बाद भी
व्यवस्थाएं पुनः पुराने ढर्रे पर लौटने की आशंका है। वहीं, झोलाछाप डॉक्टरों और अवैध बस संचालन (RTO)
पर प्रभावी अंकुश न लगना प्रशासनिक शिथिलता दर्शाता है।
·
पंचायत
एवं आवास: एलईडी लाइट ठेकों में एकल फर्म का एकाधिकार और नगर परिषद में
संपन्न लोगों को आवास आवंटन जैसी कथित प्रक्रियात्मक त्रुटियां जनचर्चा का केंद्र
बनी हुई हैं।
·
नापतोल
एवं MPEB: गड़ासरई
क्षेत्र में निजी वेंडरों द्वारा निर्धारित शुल्क से अधिक वसूली और बिजली लाइनों
के नीचे निर्माण की अनुमति में कथित लेन-देन की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं।
सीएम हेल्पलाइन (181) और जमीनी हकीकत
सूत्रों का कहना है कि जिले में कई विभागों में बिना 'सुविधा शुल्क' के फाइलों का आगे बढ़ना कठिन है। 181 पर शिकायत करने वालों को कथित तौर पर डराया-धमकाया जाता है या झूठा आश्वासन देकर शिकायत बंद करा दी जाती है, जो सुशासन की मूल भावना के विपरीत है।
प्रशासनिक उत्तरदायित्व हेतु 3 प्रमुख
प्रश्न:
1.
जवाबदेही और उपलब्धता: जब जिले की मुखिया
स्वयं फील्ड पर सक्रिय हैं, तो
संबंधित विभागों के अधिकारी अपने कार्यालयों से नदारद क्यों रहते हैं और जनता व
मीडिया से संवादहीनता क्यों बनाए हुए हैं?
2.
शिकायत निवारण की सत्यता: सीएम हेल्पलाइन पर
प्राप्त शिकायतों को 'संतुष्टि'
के बिना बंद कराने वाले कर्मचारियों पर
अब तक क्या ठोस दंडात्मक कार्रवाई की गई है?
3. जांच की निष्पक्षता: कस्तूरबा हॉस्टल के बिलों से लेकर आवास आवंटन और PMGSY के भुगतानों तक, क्या प्रशासन इनकी उच्च-स्तरीय ऑडिट कराएगा ताकि कथित वित्तीय अनियमितताओं की सच्चाई सामने आ सके?
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अस्वीकरण (Disclaimer): यह समाचार प्राप्त शिकायतों, स्थानीय जनचर्चा और सूत्रों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है। हमारा उद्देश्य किसी की छवि धूमिल करना नहीं, बल्कि संभावित प्रशासनिक विसंगतियों की ओर ध्यान आकर्षित करना है। संबंधित विभाग/अधिकारी अपना पक्ष रखने हेतु स्वतंत्र हैं।
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