डिंडौरी में निजी क्लीनिकों का निरीक्षण ,सरकारी आदेशों को ठेंगा दिखाने वाले बेख़ौफ़

 डिंडौरी - कलेक्टर श्रीमती अंजू पवन भदौरिया के निर्देश पर जिला स्तरीय टीम ने मुख्यालय के निजी क्लीनिकों का निरीक्षण किया। इस दौरान कुछ क्लीनिक बंद पाए गए, और संचालकों को वैध दस्तावेज़ जमा करने के निर्देश दिए गए। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मनोज पाण्डेय ने इस कार्रवाई को 'आगे भी जारी रखने' की बात कही।


मगर, ज़िले में स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत इन औपचारिक कार्यवाहियों से कहीं अधिक गंभीर है।  आज तक किसी बड़े दोषी के खिलाफ कोई प्रभावी या अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हुई है।

1. खुलेआम उल्लंघन: सरकारी डॉक्टर कर रहे निजी क्लीनिक संचालित

डिंडौरी जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सबसे बड़ी बाधा स्वयं शासकीय चिकित्सक बन रहे हैं। मध्यप्रदेश शासन के लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग द्वारा 07 अगस्त, 2013 को जारी आदेश (क्रमांक 1983) और 07 फरवरी, 2017 के स्पष्टीकरण के बावजूद, इन नियमों को खुलेआम ठेंगा दिखाया जा रहा है।

शासन के आदेश स्पष्ट हैं: शासकीय चिकित्सक स्वयं या परिजन के नाम से कोई क्लीनिक, नर्सिंग होम या निजी चिकित्सालय संचालित नहीं कर सकते। उन्हें निजी प्रैक्टिस के नाम पर केवल कर्तव्य की अवधि के बाहर और निवास पर ही परामर्श सेवाएँ देने की अनुमति है। यू.एस.जी. (USG) और एक्स-रे मशीन जैसे लाइसेंस आवश्यक बड़े उपकरणों को निवास पर रखना भी कतई वर्जित है।

डिंडौरी जिले में स्थिति: डिंडौरी जिले में पदस्थ अधिकतर सरकारी चिकित्सकों द्वारा इन नियमों का उल्लंघन करते हुए खुलेआम निजी प्रैक्टिस की जा रही है, जो सीधे तौर पर शासन के आदेशों का उल्लंघन है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन उल्लंघनों के खिलाफ आज तक कोई भी प्रभावी या अनुशासनात्मक कार्रवाई कभी नहीं हुई है।

2. मासूमों के जीवन से खिलवाड़: अनधिकृत चिकित्सकों का बेरोकटोक कारोबार

निजी प्रैक्टिस के अलावा, स्वास्थ्य विभाग अवैध और अप्रशिक्षित चिकित्सकों (Quacks) के पूरे कारोबार पर भी कार्रवाई करने में विफल रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में अनधिकृत चिकित्सकों का बेरोकटोक धंधा चल रहा है।

  • अवैध चिकित्सा: ज़िले में कई निजी क्लीनिकों के संचालकों के पास वैध एलोपैथी की डिग्री तक नहीं है। ये लोग गरीब और मासूम लोगों के जीवन से लगातार खिलवाड़ कर रहे हैं।

  • नियमों की सीमा: शासन ने 01 मार्च, 2017 को एक आदेश जारी कर कुछ विशेष प्रशिक्षित और पंजीकृत भारतीय चिकित्सा पद्धति के चिकित्सकों को केवल प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में प्रशिक्षण की सीमा तक एलोपैथी में व्यवसाय करने की पात्रता दी थी। इस सीमित दायरे से बाहर के सभी अनधिकृत चिकित्सक अवैध की श्रेणी में आते हैं।

जनता की मांग है कि इन अवैध चिकित्सकों के खिलाफ जल्द से जल्द एक सख्त और व्यापक मुहीम (Campaign) चलाई जाए।

3. फार्मेसी में भी नियम ताक पर: मेडिकल स्टोर्स की सघन जाँच आवश्यक

चिकित्सा क्षेत्र में नियम उल्लंघन केवल क्लीनिकों तक ही सीमित नहीं है। ज़िले भर में मेडिकल स्टोर्स (फार्मेसी) की जाँच में यह सामने आया है कि अधिकतर मेडिकल स्टोर्स में नियमों का पालन नहीं हो रहा है, जिसकी सघन जाँच आवश्यक है।

यह सीधा उल्लंघन औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (Drugs and Cosmetics Act, 1940) और औषधि और प्रसाधन सामग्री नियम, 1945 (Drugs and Cosmetics Rules, 1945) के तहत निर्धारित मानकों का है।

प्रमुख नियमों की अनदेखी:

  • फार्मासिस्ट की अनुपस्थिति: कई स्टोर्स पर बिक्री के समय पंजीकृत फार्मासिस्ट की उपस्थिति अनिवार्य होने के बावजूद, यह नियम केवल कागज़ों तक सीमित है।

  • नुस्खे की अनिवार्यता का उल्लंघन: शेड्यूल H और X की दवाइयाँ केवल पंजीकृत चिकित्सक के वैध नुस्खे पर ही बेची जा सकती हैं, लेकिन कई जगह खुलेआम एंटीबायोटिक्स और अन्य दवाइयाँ बिना नुस्खे के बेची जा रही हैं।

  • दवाई बदलना: डॉक्टर की अनुमति के बिना नुस्खे में लिखी गई दवाई को बदलना (Substitute करना) कानूनी रूप से गलत है, पर यह प्रैक्टिस आम है।

डिंडौरी की जनता अब कलेक्टर श्रीमती अंजू पवन भदौरिया से केवल छोटे क्लीनिकों पर ' कार्रवाई' के बजाय, सरकारी डॉक्टरों के नियम उल्लंघन, अवैध चिकित्सा के नेटवर्क और फार्मेसी नियमों की अनदेखी पर सख्त और निर्णायक कार्रवाई की उम्मीद कर रही है।

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