'एक बगिया माँ के नाम' योजना पर रार, जिला पंचायत अध्यक्ष और CEO के बीच तीखी झड़प के बाद मामला पुलिस तक पहुँचा

डिंडोरी। मध्य प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना 'एक बगिया माँ के नाम' डिंडोरी जिले में बड़े विवादों के घेरे में आ गई है। जिला पंचायत कार्यालय में उस वक्त हड़कंप मच गया जब भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर जिला पंचायत अध्यक्ष रुद्रेश परस्ते और मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) दिव्यांशु चौधरी (IAS) के बीच तीखी झड़प हो गई। यह विवाद अब बहस की दहलीज लांघकर पुलिस केस और FIR तक पहुँच गया है।




विवाद की मुख्य वजह: वेंडर चयन और पौधों की गुणवत्ता

जिला पंचायत अध्यक्ष रुद्रेश परस्ते ने योजना में व्यापक भ्रष्टाचार का दावा किया है। अध्यक्ष के मुख्य आरोप इस प्रकार हैं:

  • समूहों पर दबाव: आरोप है कि स्व-सहायता समूहों को स्वतंत्र रूप से पौधे खरीदने नहीं दिए जा रहे हैं।

  • पसंदीदा वेंडर: जिला पंचायत कार्यालय द्वारा तयशुदा वेंडरों से ही पौधे खरीदने का अनैतिक दबाव बनाया जा रहा है।

  • घटिया सप्लाई: सप्लाई किए गए पौधे घटिया स्तर के हैं, जो सूख चुके हैं और रोपण के लायक नहीं हैं।

अध्यक्ष ने करीब 14 करोड़ रुपये की राशि पर सवाल उठाते हुए कहा कि समूहों के अधिकारों को छीनकर चहेते वेंडरों के माध्यम से घटिया पौधे ऊंचे दामों पर खपाए जा रहे हैं।

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तीखी बहस और गंभीर आरोप

विवाद तब उग्र हो गया जब अध्यक्ष और CEO दिव्यांशु चौधरी के बीच आमना-सामना हुआ। सीईओ के अनुसार, बातचीत का स्तर तब गिर गया जब अध्यक्ष ने नियमों को दरकिनार करने की बात कही।

सीईओ दिव्यांशु चौधरी (IAS) का पक्ष:

"जब मैंने नियमों और प्रक्रिया की बात करनी चाही, तो अध्यक्ष जी भड़क गए और चिल्लाते हुए कहा कि 'मुझसे नियमों की बात मत करो।' उनका पूरा जोर 15वें वित्त आयोग की राशि और अपने तरीके से काम कराने पर था। उन्होंने मेरे साथ अभद्रता करते हुए गाली-गलौज की, जो एक लोक सेवक के लिए मानसिक प्रताड़ना है।"

अध्यक्ष रुद्रेश परस्ते का पक्ष: "बहस हुई, लेकिन अमर्यादित भाषा नहीं"

पूरे विवाद पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए जिला पंचायत अध्यक्ष रुद्रेश परस्ते ने कहा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठने वाली आवाज़ को दबाने के लिए प्रशासन अनर्गल आरोप लगा रहा है। उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए कहा:

  • संवैधानिक अधिकार: "मैं जनता का चुना हुआ प्रतिनिधि हूँ। जनता की आवाज़ उठाना, अधिकारियों से जवाब मांगना और सवाल पूछना मेरा संवैधानिक अधिकार ही नहीं, बल्कि मौलिक कर्तव्य भी है।"

  • गाली-गलौज से इनकार: उन्होंने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बहस जरूर हुई है, लेकिन उन्होंने किसी भी तरह की अमर्यादित भाषा या गाली-गलौज का प्रयोग नहीं किया है।

  • भ्रष्टाचार पर वार: परस्ते का आरोप है कि जब उन्होंने वेंडरों द्वारा सप्लाई किए गए घटिया पौधों और समूहों पर बनाए जा रहे दबाव पर सवाल किए, तो सीईओ ने संतोषजनक जवाब देने के बजाय मामले को भटकाने की कोशिश की।

 पुलिस की कार्रवाई और जांच

विवाद के बाद सीईओ सीधे एसपी कार्यालय पहुँचे और शिकायत दर्ज कराई। एसपी श्रीमती वाहिनी सिंह ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कहा:

"सीईओ द्वारा दुर्व्यवहार की शिकायत मिली है। हम पूरे घटनाक्रम की सूक्ष्मता से जांच करा रहे हैं। मौके पर मौजूद गवाहों के बयान लिए जा रहे हैं, जिसके आधार पर अगली कानूनी कार्रवाई की जाएगी।"

निष्कर्ष: सरकार और संगठन के लिए असहज स्थिति

भाजपा समर्थित अध्यक्ष द्वारा अपनी ही सरकार की योजना पर सवाल उठाना और प्रशासनिक अधिकारी के साथ इस तरह का टकराव, जिले के राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब देखना यह है कि प्रशासन और संगठन इस "सांप-छछूंदर" वाली स्थिति से कैसे निपटते हैं।

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