शासकीय महाविद्यालय में आज भगवान श्री बलराम जयंती यानी हल षष्ठी का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास और गरिमामयी तरीके से मनाया गया। इस विशेष आयोजन की शुरुआत भगवान बलराम के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्जवलन के साथ की गई, जिसमें महाविद्यालय परिवार के सभी सदस्य और विद्यार्थी उत्साहपूर्वक सम्मिलित हुए।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री बिहारी लाल साहू ने अपने संबोधन में कहा कि भगवान बलराम शेषनाग के अवतार, कृषि के देवता और हलधर के रूप में पूजे जाते हैं। उन्होंने अपने हल से यमुना जी की धारा को वृंदावन की ओर मोड़ने का अद्भुत कार्य किया था। यह पावन प्रसंग हमें सिखाता है कि दृढ़ संकल्प से दुनिया की बड़ी से बड़ी बाधा को भी आसानी से पार किया जा सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बलराम जयंती को किसान दिवस के रूप में मनाना वास्तव में हमारी महान भारतीय कृषि संस्कृति का सच्चा सम्मान है।
महाविद्यालय के प्राचार्य श्री पी.एस. वरकड़े ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान बलराम का जीवन श्रम, बल और सादगी का सबसे बड़ा प्रतीक है। उनका पावल हल और मूसल हमें सदैव आत्मनिर्भरता और किसान भाईयों के सम्मान का संदेश देता है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि उन्हें आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ शारीरिक श्रम को भी अपने जीवन में विशेष महत्व देना चाहिए।
समारोह के अन्य वक्ताओं में श्री भगवत सिंह धुर्वे ने भगवान बलराम के जीवन को शक्ति और विनम्रता का अनूठा संगम बताया। वहीं डॉ. नरेन्द्र सिंह ठाकुर ने जानकारी देते हुए बताया कि भगवान बलराम को स्नेह से 'बलदाऊ' भी कहा जाता है। वे गदा विद्या और युद्ध कला में अत्यधिक निपुण थे और महाभारत काल के दो महान योद्धाओं भीम तथा दुर्योधन दोनों के गुरु रहे। उन्होंने हमेशा बिना किसी पक्षपात के सदैव सत्य और धर्म के मार्ग का अनुसरण किया।
इस भव्य आयोजन का सबसे बड़ा और मुख्य आकर्षण श्री अभिषेक पटेल का प्रेरणादायक उद्बोधन रहा। उन्होंने भगवान बलराम के न्यायप्रिय स्वभाव को उजागर करते हुए उनके तीन प्रमुख शिष्यों भीम, दुर्योधन और कीचक की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि किस प्रकार बलराम जी ने बिना किसी भेदभाव के भीम और दुर्योधन को समान रूप से गदा युद्ध की शिक्षा दी। महाभारत के युद्ध में जब भीम ने नियमों के विरुद्ध जाकर दुर्योधन की जांघ पर प्रहार किया, तब गुरु बलराम ने क्रोधित होकर अपना हल उठा लिया था, जो उनके निष्पक्ष और अधर्म-विरोधी चरित्र का सबसे बड़ा प्रमाण है। इसके साथ ही उन्होंने अभिमानी कीचक का प्रसंग सुनाते हुए यह समझाया कि शक्ति का दुरुपयोग करने वाले का विनाश तय होता है। उनके अनुसार बलराम जी के लिए हर शिष्य पुत्र के समान था, और वे सदैव निष्पक्षता के साथ धर्म के पक्ष में खड़े रहे।
इस गरिमामयी आयोजन को सफल बनाने में डॉ. सी.एल. रैदास, डॉ. राजेश तिवारी, डॉ. ए.के. झारिया, डॉ. खेमराज कनौजिया, डॉ. प्रीति नेगी, डॉ. निहारिका सेंगर, डॉ. अंचल वर्मा, श्री मधुर मरावी, सुश्री श्रुति जैन, डॉ. जाग्रति, श्री आलोक दहिया तथा छात्र-छात्राओं में कु. भूमिका, कु. माहेश्वरी और कु. पूनम सहित संपूर्ण महाविद्यालय परिवार का विशेष योगदान रहा।

0 टिप्पणियाँ