इस पूरे घटनाक्रम के तूल पकड़ने के बाद जब प्रशासनिक पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो तहसीलदार राम प्रसाद मार्को का कहना है कि वे केवल राज्य शासन के दिशा-निर्देशों और आदेशों के पालन में मीसाबंदी का सम्मान करने पहुंचे थे। उनका यह भी तर्क है कि चूँकि यह पूरा जमीन विवाद का मामला माननीय उच्च न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए वे इस विषय पर फिलहाल कोई अधिकारिक टिप्पणी या प्रतिक्रिया देने से असमर्थ हैं। प्रशासन की अपनी विधिक दलीलें हैं, लेकिन दूसरी तरफ मीसाबंदी का यह स्पष्ट और दो टूक रुख शासन की व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करता है।
इस पूरे प्रकरण को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार बेहद गर्म है और सूत्रों के हवाले से आज के इस घटनाक्रम को स्थानीय स्तर पर पार्टी की आपसी गुटबाजी से भी जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक समीकरणों और अंदरूनी खींचतान के कारण मीसाबंदी को न्याय मिलने में आ रही कथित बाधाओं ने मामले को और पेचीदा बना दिया है। आपको बता दें कि मंडल अध्यक्ष भजन चक्रवर्ती द्वारा निजी जमीन पर किए गए कथित अवैध कब्जे के इस गंभीर मामले को लेकर पूर्व में भी पीड़ित पक्ष द्वारा जिला कलेक्टर को अपना ताम्र पत्र वापस करने का प्रयास किया गया था। उस दौरान भी इस मामले ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं और 'सत्य प्रहार'ने इस खबर को बेहद प्रमुखता से उठाया था।
गौर करने वाली बात यह है कि घटना के चार महीने से अधिक का लंबा समय बीत जाने के बाद भी धरातल पर कोई ठोस कार्रवाई देखने को नहीं मिली है। चार महीने पहले उठी न्याय की गूंज आज स्वतंत्रता दिवस के दिन एक बड़े विरोध के रूप में सीधे तौर पर सामने आ चुकी है। एक मीसाबंदी का यह संघर्ष इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि व्यवस्था चाहे जितनी भी मजबूत हो, जब व्यक्ति के हक पर डाका पड़ता है तो लोकतंत्र के ये सेनानी झुकना नहीं जानते। आज के इस बड़े घटनाक्रम ने शहपुरा सहित पूरे जिले में हलचल मचा दी है, और हर किसी की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन इस पर आगे क्या कदम उठाता है।
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