मध्य प्रदेश का जनजातीय बहुल डिंडौरी जिला एक बार फिर दुनिया के सबसे प्राचीन और दुर्लभ ऐतिहासिक रहस्यों को लेकर सुर्खियों में है। डिंडौरी के घने वनांचल में हाल ही में हुए भू-वैज्ञानिक और पुरातात्विक सर्वेक्षण के दौरान एक अभूतपूर्व खोज सामने आई है। यहाँ बैगा आदिवासियों द्वारा एक पारंपरिक देवस्थल पर पूजे जा रहे एक अजीबोगरीब पत्थर की पहचान लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पुराने दुर्लभ 'कोरल जीवाश्म' (Coral Fossil) के रूप में हुई है। यह अनूठी खोज तब संभव हुई जब जिले की अनछुए ऐतिहासिक और प्राकृतिक संपदा का दस्तावेजीकरण कर रही विशेषज्ञों की टीम की नजर आदिवासियों के इस पूज्य स्थल पर पड़ी। जब इस परतदार चट्टान के नमूनों की प्रयोगशाला में विस्तृत जांच की गई, तो यह वैज्ञानिक सत्य सामने आया कि जिसे ग्रामीण पीढ़ियों से एक पवित्र शिला मानकर पूज रहे थे, वह दरअसल डायनासोर के युग (Cretaceous Period) का एक अति-दुर्लभ समुद्री जीवाश्म है।
इस ऐतिहासिक पड़ताल के केंद्र में क्षेत्र का पारंपरिक बैगा आदिवासी समुदाय है, जो आधुनिक विज्ञान और तकनीकों से अनजान होने के बावजूद सदियों से इस अमूल्य धरोहर को सहेजे हुए था। इतिहासकारों के अनुसार इस स्थल पर जारी पूजा-अर्चना की यह परंपरा 8,000 से 10,000 साल पुरानी हो सकती है। प्राचीन काल में जब स्थापत्य कला के रूप में भव्य मंदिरों का निर्माण शुरू नहीं हुआ था, तब मानव प्रकृति के अद्भुत घटकों जैसे विशालकाय वृक्षों, रहस्यमयी पहाड़ियों और अनूठी चट्टानों को ही दिव्य शक्ति मानकर पूजता था और यही परंपरा आज भी इस अंचल में जीवित है।
डिजिटल मीडिया और शोधार्थियों के बीच इस खबर के सामने आते ही यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर ये जीवाश्म होते क्या हैं और करोड़ों साल पहले इनका निर्माण कैसे हुआ था?
जीवाश्म (Fossils) दरअसल प्राचीन काल के जीवों, वनस्पतियों या समुद्री जीवन के वे अवशेष होते हैं जो पृथ्वी में आई भयानक उथल-पुथल के दौरान मिट्टी, गाद और कीचड़ की परतों के नीचे दब गए थे। लाखों-करोड़ों वर्षों तक ऑक्सीजन की गैरमौजूदगी, ऊपर से पड़ने वाले भारी दबाव और भूगर्भीय तापमान के कारण इन मृत अवशेषों के कार्बनिक हिस्से धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं और उनकी जगह आसपास मौजूद खनिज पदार्थ (Minerals) ले लेते हैं। इस पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया को 'अश्मीकरण' (Petrification) कहा जाता है, जिससे जीव का ढांचा या उसकी छाप हूबहू सख्त पत्थर में तब्दील हो जाती है। डिंडौरी के जंगल में मिला यह कोरल (मूंगा) जीवाश्म दरअसल उस प्राचीन समुद्री जीवन का प्रमाण है, जो यह दर्शाता है कि करोड़ों साल पहले मध्य भारत का यह इलाका या तो किसी विशाल समुद्र के नीचे था या फिर नर्मदा घाटी का यह क्षेत्र सीधे समुद्री जलमार्ग से जुड़ा हुआ था।
समय के चक्र को 6.5 करोड़ साल पीछे घुमाकर देखें तो यह जीवाश्म पृथ्वी के उस भयानक प्रलयकारी दौर का गवाह है जब अंतरिक्ष से गिरे एक विशाल क्षुद्रग्रह (Asteroid) और भारत के दक्कन पठारी क्षेत्रों (Deccan Traps) में हुए प्रचंड ज्वालामुखी विस्फोटों ने पूरी दुनिया का मौसम बदलकर रख दिया था। इसी उथल-पुथल के दौर में नर्मदा पट्टी पर विचरण करने वाले विशालकाय राजासॉरस जैसे डायनासोरों समेत पृथ्वी के 75 प्रतिशत जीवों का अस्तित्व हमेशा के लिए समाप्त हो गया था। बैगा समाज द्वारा संरक्षित इस प्राचीन प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित करने के लिए अब प्रशासनिक स्तर पर कदम उठाए जा रहे हैं और डिंडौरी के इस मानव-वैज्ञानिक खजाने के चुनिंदा जीवाश्मों को जल्द ही भोपाल स्थित राज्य संग्रहालय (State Museum Bhopal) की एक नई विशेष गैलरी में आम जनता, पर्यटकों और शोधार्थियों के देखने के लिए प्रदर्शित किया जाएगा।
डिस्क्लेमर (Disclaimer) एवं समाचार स्रोत:
यह समाचार रिपोर्ट इंटरनेट एवं प्रमुख मीडिया स्रोतों (नवभारत टाइम्स / टाइम्स नेटवर्क / इंटरनेट मीडिया रिपोर्ट्स) में प्रकाशित प्राथमिक जानकारियों एवं भू-वैज्ञानिक संदर्भों के विश्लेषण के आधार पर 'सत्य प्रहार' द्वारा तैयार की गई है। इस रिपोर्ट का उद्देश्य पाठकों को ऐतिहासिक और वैज्ञानिक तथ्यों से अवगत कराना है।

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