डिंडोरी: जिले में खाद्य सुरक्षा और विभागीय मानकों के अनुपालन को लेकर चल रहे जांच अभियानों का सिलसिला इन दिनों शहर की सबसे बड़ी चर्चा बन चुका है। एक तरफ जब प्रशासनिक अमला औचक निरीक्षण के नाम पर सड़कों पर उतरता है, तो उसकी सक्रियता देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मानो शहर के हर कोने की सेहत सुधारने का बीड़ा उठा लिया गया हो। हालांकि, इस पूरी प्रशासनिक सक्रियता के तौर-तरीकों और उसके धरातल पर दिख-दिखाव को लेकर स्थानीय नागरिकों और जानकारों के बीच तीखा व्यंग्य और बहस छिड़ गई है कि आखिर यह 'न्याय' हर जगह एक समान क्यों नहीं दिखाई देता।
कानून की किताबों की बात करें तो खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 (FSSAI Act 2006) की धारा 31 के तहत बिना वैध पंजीकरण या लाइसेंस के कारोबार करना एक गंभीर उल्लंघन है, जिसके लिए धारा 63 के अंतर्गत 6 महीने तक की कैद और 5 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। इसके अलावा, खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता में गड़बड़ी पाए जाने पर धारा 50 और धारा 51 के तहत भारी आर्थिक दंड की गाज गिर सकती है। साथ ही, राष्ट्रीय भवन संहिता (NBC) और संबंधित सुरक्षा नियमों के तहत किसी भी बहुमंजिला या रूफ-टॉप रेस्टोरेंट और होटल में अग्नि सुरक्षा (Fire Safety) के पुख्ता इंतजाम और आपातकालीन निकास का होना अनिवार्य है, ताकि किसी भी अनहोनी से बचा जा सके और नियमों की अनदेखी पर परिसरों को सील तक किया जा सके।
लेकिन विडंबना यह है कि जब अमला मैदान में उतरता है, तो इन भारी-भरकम कानूनी धाराओं और सुरक्षा मानकों का डर अमूनन उन छोटे और मध्यम श्रेणी के रेहड़ी-पटरी या दिहाड़ी दुकानदारों के माथे पर चमकता है, जो दो वक्त की रोटी कमाने के लिए धूप-छांव में संघर्ष करते हैं। इसके विपरीत, जिला मुख्यालय से लेकर ग्रामीण ब्लॉकों तक फैले बड़े-बड़े रेस्टोरेंट्स, होटल और आलीशान परिसरों में यदि सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ती भी रहें, तो वहां विभाग की नजरें अक्सर 'सुविधाजनक तरीके' से फेर ली जाती हैं'।
इसी कड़ी में हाल ही में जिला मुख्यालय स्थित एक प्रतिष्ठित (कोर्टयार्ड) में भी जांच दल के पहुंचने की दबी-छिपी चर्चाएं सामने आई थीं, किंतु उस जांच के बाद क्या जादू हुआ और कौन सा निष्कर्ष निकला, इसका पर्दा आज तक आधिकारिक रूप से नहीं उठाया गया है। गलियारों में तो यहां तक चुटकियां ली जा रही हैं कि शायद इस फाइल पर ऐसा पर्दा पड़ा है कि उसकी रिपोर्ट कभी सूरज की रोशनी देख ही नहीं पाएगी।
जब इस पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता को टटोलने के लिए 'सत्य प्रहार' ने खाद्य सुरक्षा अधिकारी से फोन पर और व्यक्तिगत रूप से संपर्क करना चाहा, तो न तो कोई स्पष्ट जानकारी मिल पाई और न ही मुलाकात हो सकी। उल्टे, जिम्मेदार अधिकारी ने प्रति-प्रश्न दाग दिया कि "आप सभी रेस्टोरेंट्स की जांच क्यों नहीं करते हैं?"
यहाँ यह याद दिलाना प्रासंगिक होगा कि एक स्वतंत्र मीडिया संस्थान और पत्रकार होने के नाते हमारा दायित्व जनता के हक की आवाज उठाना और आईना दिखाना है, न कि खुद दफ्तरों में बैठकर जांच के दस्तावेज खंगालना या छापेमारी करना। जब एक जिम्मेदार अधिकारी जनता के जायज सवालों पर खुद को कटघरे में महसूस कर मीडिया से ही यह पूछ बैठे कि आप फलां जगह के बारे में सवाल क्यों कर रहे हैं, तो प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठना लाजमी है।
'सत्य प्रहार' पूरी गंभीरता और सीमाओं के दायरे में रहकर यह उम्मीद करता है कि जिला प्रशासन इस 'चयनात्मक' कार्यशैली पर आत्ममंथन करेगा। यह सुनिश्चित किया जाना बेहद जरूरी है कि नियमों का हंटर केवल कमजोर कंधों और छोटी दुकानों पर ही न चले, बल्कि बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के सुरक्षा मानकों की भी उतनी ही निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो, ताकि आम नागरिकों की सुरक्षा से खिलवाड़ न हो और व्यवस्था पर से जनता का भरोसा न डगमगाए।
जिम्मेदार अधिकारी द्वारा जवाब न मिलने पर अब हम उनके अधिकारी और जिला के आला अधिकारियों से भी जल्द ही सवाल पूछेंगे और तब तक इस खबर को उठाते रहेंगे जब तक की न्याय पूर्ण कार्यवाही ना हो |

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