डिंडोरी। जिले में शिक्षा और व्यवस्था के दावों की जमीनी हकीकत का एक और उदाहरण आज जिला मुख्यालय की जनसुनवाई में देखने को मिला। ग्राम घानामार से आए अभिभावकों और ग्रामीणों ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर एक ऐसी व्यथा सुनाई, जो न केवल हैरान करने वाली है, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता पर गंभीर सवाल भी खड़ा करती है।
स्कूल नहीं, खतरों का घर बना शिक्षण संस्थान ग्रामीणों का कहना है कि गांव में स्थित प्राथमिक शाला और आंगनबाड़ी केंद्र का भवन पूरी तरह जर्जर हो चुका है। स्थिति इतनी दयनीय है कि बारिश के मौसम में छत से पानी टपकने और दीवारें गिरने का डर बना रहता है। गौरतलब है कि अभी दो दिन पहले ही देश ने अपनी आजादी का 80वां पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया है, लेकिन घानामार के इस स्कूल की बदहाल तस्वीर आजादी के उन दावों को मुंह चिढ़ाती नजर आती है। भवन की दयनीय हालत देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां पदस्थ गुरुजी ने स्कूल भवन की साफ-सफाई और रखरखाव का कितना 'ध्यान' रखा है। बावजूद इन हालातों के, वहां 70 से अधिक बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर हैं।
जनसुनवाई में पहुंचे मोहम्मद अमजद रज़ा और अन्य ग्रामीणों ने बताया कि हमने स्कूल से लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों तक कई बार गुहार लगाई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला। जब कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई, तो अंततः हार मानकर हमें कलेक्टर मैडम के पास आना पड़ा।
ज़िम्मेदार अधिकारी 'साइलेंट मोड' पर? इस गंभीर मामले की सच्चाई जानने के लिए जब प्राथमिक शाला के प्रधान पाठक मनोज कुशराम से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने फोन रिसीव करना मुनासिब नहीं समझा। वहीं, इस पूरे घटनाक्रम पर जिले के डीपीसी अमित गोलिया का पक्ष जानने के लिए उनके कार्यालय और मोबाइल पर कई बार संपर्क किया गया, लेकिन संपर्क नहीं हो सका। शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों की यह चुप्पी कई तरह के सवाल पैदा करती है।
वहीं, दूसरी ओर महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रभारी श्री श्याम सिंगौर ने कहा कि पूर्व का भवन जर्जर होने के कारण नवीन भवन हेतु प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। वर्तमान में आंगनबाड़ी को एक सामुदायिक भवन में संचालित किया जा रहा है, वहां स्थिति ठीक है।
क्या प्रशासन किसी बड़ी घटना का इंतज़ार कर रहा है? सवाल यह है कि क्या जर्जर भवन में मासूम ननिहालों को बैठाना उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है? क्या प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना का इंतज़ार कर रहा है? क्या एक प्रस्ताव भेज देने मात्र से विभाग अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो जाता है?
घानामार के ग्रामीणों की यह आवाज़ प्रशासन के लिए एक चेतावनी है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इन मासूमों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कब तक ठोस कदम उठाता है, या फिर यह फाइल भी अन्य फाइलों की तरह धूल फांकती रहेगी।

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