डिंडोरी: जिले में एक तरफ सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार और आम जनता की समस्याओं के समाधान के लिए बड़े-बड़े आयोजनों और अभियानों का दौर चल रहा है, वहीं दूसरी ओर महकमों की उदासीनता और कागजी कमियों के कारण आज भी कई जरूरतमंद गांव और टोले सरकारी सहायता से अछूते हैं। ऐसा ही एक ताजा मामला जनपद पंचायत बजाग के अंतर्गत सामने आया है, जहां हाल ही में आयोजित 'मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान' स्थल बोन्दर से चंद किलोमीटर की दूरी पर बसा बैगा टोला (ग्राम बसनिया, ग्राम पंचायत ऊफरी) आज भी सरकारी रिकॉर्ड से गायब नजर आ रहा है।
'जनमन' योजना से वंचित बैगा परिवार, नाम ही सूची से गायब
इस ग्राम में लगभग 200 से 300 की संख्या में विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा समुदाय के लोग निवास करते हैं, जो यहां सदियों से रहते आ रहे हैं। ग्रामीणों का दर्द है कि प्रधानमंत्री आवास योजना (जनमन योजना) के तहत उन्हें आज तक एक भी आवास का लाभ नहीं मिला है।
जब ग्रामीणों ने इस बारे में संबंधित विभाग के अधिकारियों के समक्ष अपनी आवाज उठाई, तो उन्हें चौंकाने वाला जवाब मिला—विभाग का कहना है कि ऊपर से आई हुई मुख्य सूची में इस गांव और उनके नाम का ही उल्लेख नहीं है, इसलिए उन्हें इस योजना का लाभ नहीं दिया जा सकता। ऐसे में, एक पूरी आदिवासी बस्ती का सरकारी दस्तावेजों से गायब हो जाना प्रशासनिक व्यवस्थाओं और मैदानी सर्वे पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
जिम्मेदार अधिकारियों का पक्ष
इस पूरे मामले पर जब हमने जनपद पंचायत बजाग के सीईओ श्री सचिन अग्रवाल से बात की, तो उन्होंने स्वीकार किया कि यह मामला अभी उनके संज्ञान में आया है।
"जब हमने इस मामले की पड़ताल की, तो पता चला कि ऊपर से प्राप्त हुई मूल सूची में इस गांव का नाम शामिल नहीं है। इस संबंध में आगे की उचित कार्यवाही के लिए कलेक्टर महोदया को भी पत्र लिखकर पूरी स्थिति से अवगत करा दिया गया है।" — श्री सचिन अग्रवाल, जनपद सीईओ, बजाग
अब सोचने वाली बात यह है कि महज कुछ कागजी औपचारिकताओं और तकनीकी कमियों के कारण एक पूरे गांव का इस महत्वपूर्ण और कल्याणकारी योजना से बाहर हो जाना कितना न्यायसंगत है? हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि व्यवस्था की इस बड़ी खामी पर सवाल उठाना है ताकि समय रहते इन वंचितों को उनका हक मिल सके।
नल-जल योजना बनी सिर्फ दिखावा, पानी के नाम पर वसूली के आरोप
विकास के दावों की पोल खोलती बसनिया बैगा टोला की यह तस्वीर सिर्फ आवास तक ही सीमित नहीं है। ग्रामीणों ने बताया कि उनके गांव में कहने के लिए नल-जल योजना के तहत पाइपलाइन तो बिछा दी गई, लेकिन आज तक एक बूंद पानी भी नसीब नहीं हुआ।
गांव के गरीब मगलू बैगा और मंगली बैगा सहित अन्य महिलाओं ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया कि नल कनेक्शन के नाम पर उनसे 100 रुपए महीना तक की मांग की गई थी। कुछ लोगों ने मजबूरी में पैसे दे भी दिए, इसके बावजूद आज तक उनके घरों तक पानी नहीं पहुंचा। यह नल योजना गांव के लिए सिर्फ एक छलावा और दिखावा बनकर रह गई है। स्थिति यह है कि ग्राम पंचायत से भी सुध लेने वाला कोई नहीं आता कि इस दूरदराज के टोले के क्या हाल हैं।
कलेक्ट्रेट के चक्कर काटते-काटते थक चुके हैं ग्रामीण, प्रशासन से उठा भरोसा
जब हमने इन भोले-भाले आदिवासियों से पूछा कि आपने हाल ही में बोनदर में हुए मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान के तहत इसके लिए कोई आवेदन या आवाज क्यों नहीं उठाई, तो उनका दर्द छलक उठा। उन्होंने बताया कि वे पिछले एक-दो साल से लगातार कलेक्ट्रेट कार्यालय के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं और अब पूरी तरह हार मान चुके हैं।
व्यवस्था से इस तरह भरोसा उठना लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। बातचीत के दौरान कुछ ग्रामीण महिलाएं प्रशासन से बेहद रुष्ट नजर आईं। उनका आक्रोश साफ झलकता हुआ कहना था— "हमें देखिए, हमारा पहनावा देखिए, हमारा गुदना (टैटू) देखिए और खुद बताइए कि हम बैगा हैं या नहीं हैं?"
महिलाओं ने दोटूक शब्दों में चेतावनी भरे लहजे में यह भी कह दिया कि इस बार वे वोट उसी को देंगी जो उनका काम करेगा, अन्यथा नोटा या किसी को भी वोट न देने की बात कहते हुए वे व्यवस्था के खिलाफ खड़ी नजर आईं। इस तरह की जमीनी हकीकत सामने आना शासन-प्रशासन के लिए एक गंभीर 'अलर्ट' है, क्योंकि जनता का प्रशासनिक व्यवस्थाओं से इस तरह विश्वास उठना कतई सही नहीं है।
अब इस खबर के सामने आने के बाद यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि जिला प्रशासन इस पर क्या त्वरित कदम उठाता है और कैसे इस भूले-बिसरे बैगा टोले को मुख्यधारा से जोड़कर उनके अधिकारों को सुनिश्चित किया
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