मध्य प्रदेश में लंबे समय से लंबित अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण के विवाद पर जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्य पीठ ने अपना अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुना दिया है। उच्च न्यायालय की जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने 159 पृष्ठों के विस्तृत आदेश में मार्च 2019 के उस राज्य संशोधन अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर निरस्त कर दिया है, जिसके जरिए ओबीसी आरक्षण की सीमा को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया था। इस ऐतिहासिक फैसले के आने के बाद अब राज्य में ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण की वैधानिक सीमा 14 प्रतिशत ही लागू रहेगी।
माननीय अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा इंदिरा साहनी मामले में तय की गई कानूनी व्यवस्था का स्पष्ट संदर्भ दिया है। खंडपीठ ने रेखांकित किया कि कुल आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत के पार ले जाने के लिए राज्य सरकार के पास कोई पर्याप्त आधार, असाधारण परिस्थितियां या संवैधानिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके। इसके साथ ही अदालत के सामने पेश किए गए प्रामाणिक आंकड़ों के अध्ययन के आधार पर यह पाया गया कि राज्य की प्रशासनिक सेवाओं और उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व पहले से ही पर्याप्त है, इसलिए 50 फीसदी की तय कानूनी सीमा का उल्लंघन करना न्यायसंगत नहीं है।
विगत कुछ वर्षों से जारी कानूनी प्रक्रिया के कारण प्रभावित हुई सरकारी भर्तियों और अभ्यर्थियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने 87:13 फॉर्मूले के तहत होल्ड पर रखे गए 13 प्रतिशत पदों पर बहुत स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। पीठ ने आदेश दिया है कि पिछले वर्षों से अटके पड़े इन 13 प्रतिशत पदों को अब अनारक्षित यानी सामान्य (General) वर्ग के अभ्यर्थियों से भरा जाए। अदालत ने राज्य प्रशासन को यह पूरी प्रक्रिया अगले तीन महीनों की निर्धारित समय-सीमा के भीतर अनिवार्य रूप से पूर्ण करने के सख्त निर्देश दिए हैं, जिससे भर्ती परीक्षाओं के परिणामों का इंतजार कर रहे हजारों युवाओं को राहत मिल सके।
वहीं दूसरी ओर, पूर्व में चयनित हो चुके अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा करते हुए हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत ने साफ किया है कि 2 मार्च 2019 से लेकर 29 सितंबर 2022 के बीच 27 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था के आधार पर जिन अभ्यर्थियों का अंतिम चयन और नियुक्तियां पूरी हो चुकी हैं, उन पुरानी चयन प्रक्रियाओं पर इस निर्णय का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा और उनकी सेवाएं पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी।
उल्लेखनीय है कि मार्च 2019 में तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा अध्यादेश जारी कर ओबीसी आरक्षण को 27 प्रतिशत किया गया था, जिसे तुरंत बाद याचिकाओं के जरिए उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। लगभग सात वर्षों तक चली गहन सुनवाई और विधि विशेषज्ञों की दलीलों पर विचार करने के उपरांत अदालत ने अपने अंतिम निर्णय में संविधान के सिद्धांतों और विधिक मर्यादाओं को सर्वोपरि रखा है। विधिक विशेषज्ञों के अनुसार इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में अपील किए जाने की संभावना बनी हुई है।

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